مــأدبــــة

 

أخيراً دعاني إلى المأدبــــة

انتقيت ثوباً.. طويـــلاً.. طويلاً..
كــمــا الوقت ذاك النهار!
واحتواني.. ذاك السوار..
ودبـــوسٌ يتلألأ..
كمــا الأفئدة..
بلا شرار!
أفتش عنك..
بلا أسئلة..!

وكان الوصول..
رأيتُ الحشودَ..
وساقيات..!
وشمعات..

ولوحة بحجم السماء..
تــُـرى من تكون؟
تكشّــفَ الثوب عنها.. ولا يشوبها احمرار..
أو ذبول!

حقيبتي..
وشاحي..
وخصلات شعري..
تفتش عنك..
بـــــــلا أسئلة..

فتاة من جموع الساقيات تبتسمْ
وتقدم الحلوى.. بفنْ!
والقليل من الشراب..
بلا ثمنْ!
أفتش عنك..
بلا أسئلة..!

منزويةٌ.. أراني..
وقلبي كهرّة..
كـــــــــــــم أودُّ الانقضاض..
فهلاّ ظهرتَ.. سريعاً.. لتطفئَ بعض الشمعات..
وتراقصني..
فأُخطيءَ الخطوات..
وأنــْـــــــتـَـــــــشـــي..
مع لحونٍ من فضائكَ..
والقمر!
أفتش عنك..
بلا أسئلة..!

حتى العطرُ في جيدي.. تبـــدّدَ
ولون بشفتي.. يكاد يزول..
ولم يمتدحه سوى.. الساقيات!

وأطراف ثوبٍ نــُــســِجَ لكَ وحدكْ..
متى ينتهي الزحام..
ونزور الجــدول..
فأرفــعــُـها..
وأُسابـِـــقـُـــك؟
أفتش عنك..
بلا أسئلة..!

لا أحب الساقيات..
كأنهن عشيقات..
أو
مزاراتٍ لنزواتك..
إن فارقــْـــتـــني.. ذات مساء!

ربـــــــــاه..
أغرقني وسط الجموع..
دعني أتوه مع آخر..
أو آخرين..
فلن أرضى بالخيبة..
إن قررتُ فجأة..
الرجـــــــــــوع!

تعليق واحد

  1. دكتورريان قال,

    صباحكِ عطر شانتال
    رقيقة تلك الحروف التي تصور عمق المشاعر
    لتأخذنا بين أبرح الروعة وشواىء الإبداع
    كنت هنا ..في بصيص ضوئكِ

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